Skip to main content

आसमाँ भी चहिए थोड़ी ज़मीं भी चाहिए,

                                           तेरी दुनियाँ ही नहीं तेरा यक़ीं भी चाहिए.     
                                                
                                                          
 गुरुवार, 6 फ़रवरी, 2014 को 12:17 IST तक के समाचार
भारत के गांव-कस्बों से हजारों लोग हर दिन अपने सपनों की तलाश में बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं, लेकिन उन सपनों का क्या जो इन बड़े शहरों की गुमनाम दीवारों में कैद होकर रह जाते हैं.
दूरदराज के इलाकों से बड़ी संख्या में बच्चों को अवैध रूप से शहर लाकर उनसे जबरन काम कराया जाता है.
ऐसी ही एक लड़की लक्ष्मी है, जिसे चार साल पहले पूर्वोत्तर भारत के एक गांव से अपहरण करके दिल्ली लाया गया था.
बाल संरक्षण अधिकारियों ने उसे बचा तो लिया है, लेकिन वो अभी काफी कमजोर और डरी हुई है. 13 साल की लक्ष्मी पश्चिम दिल्ली में लोगों के घरों में खाना बनाने, साफ-सफाई और बच्चों के देखभाल का काम करती थी.

यौन दुर्व्यवहार

लक्ष्मी बताती है, "मुझे आराम करने की इजाज़त नहीं थी. कोई ग़लती करने या उनकी मर्जी के मुताबिक़ काम नहीं करने पर वो मुझे मारते थे."
उसने बताया, "मुझे कभी भी घर से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं मिलती थी, इसलिए मुझे पता नहीं नहीं चला कि मैं दिल्ली में हूं. मुझे काम पर रखने वाले ने मुझे बताया कि हम मद्रास में हैं."
"ये भारत के विकास का सर्वाधिक अफसोसजनक पहलू है. मध्य वर्ग सस्ते और उनके काबू में रहने वाले मजदूर की मांग कर रहा है. "
कैलाश सत्यार्थी, बचपन बचाओ आन्दोलन
लक्ष्मी ने यह भी बताया कि उसका अपहरण करने वाले व्यक्ति ने उसके साथ यौन दुर्व्यवहार भी किया.
लक्ष्मी के माता-पिता बचपन में ही चल बसे थे. उसके चाचा उसे वापस पाकर काफी खुश हैं. वो असम के चाय बागान में मजदूरी करते हैं.
लक्ष्मी के चाचा बताते हैं, "हम कर ही क्या सकते हैं? हम ग़रीब लोग हैं- मेरे पास इतना धन नहीं है कि मैं दिल्ली आकर अपनी गुमशुदा भतीजी की तलाश करता."

गुलामी की ज़िंदगी

ये कहानी सिर्फ लक्ष्मी की नहीं है. भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा गुम होता है और उनमें से लगभग आधे बच्चे फिर कभी नहीं मिलते.
अगवा किए गए बच्चों को अक्सर यौन कारोबार में ढकेल दिया जाता है. लेकिन ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जिसमें बच्चों को घरेलू काम में लगा दिया जाता है. ये बच्चे घर की चारदीवारी में बंद रहते हैं और आम लोगों की नज़र में नहीं आते हैं.
सरकारी अनुमानों के मुताबिक़ करीब पांच लाख बच्चे इस हालत में हैं.
बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था 'बचपन बचाओ आंदोलन' के प्रमुख कैलाश सत्यार्थी का कहना है, "ये भारत के विकास का सर्वाधिक अफसोसजनक पहलू है. मध्यवर्ग सस्ते और उनके काबू में रहने वाले मजदूर की मांग कर रहा है."

क़ानूनी स्थिति

भारत में कथित रूप से मानव तस्करी की शिकार महिला
सत्यार्थी कहते हैं, "ऐसे में सबसे सस्ते और कमजोर श्रमिक बच्चे ही हैं. खासतौर से लड़कियां. ऐसे में सस्ते मजदूर की मांग भारत के दूरदराज के गांवों से बड़े शहरों की तरफ बच्चों की तस्करी को बढ़ावा दे रही है."
एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में दुनिया के किसी भी हिस्से के मुकाबले अधिक बाल मजदूर हैं.
जाहिर तौर पर बच्चों का अपहरण ग़ैरक़ानूनी है, लेकिन इस मसले पर क़ानूनी स्थिति साफ़ नहीं है कि कब वो क़ानूनी तौर से काम कर सकते हैं.
बाल श्रम क़ानून 14 साल से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखने की इजाज़त नहीं देता है, लेकिन क़ानूनी रूप से 18 वर्ष से कम उम्र होने पर उसे बच्चा ही माना जाता है.

बदलाव की उम्मीद

"संसद में एक संशोधन लंबित है. हालांकि ये संशोधन काफी समय से लटका हुआ है."
कुशल सिंह, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की प्रमुख
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की प्रमुख कुशल सिंह बताती हैं, "दुर्भाग्य से हमारा बाल श्रम निषेध और विनियमन क़ानून पूरी तरह से पुराना पड़ चुका है."
वो बताती हैं, "ये क़ानून कहता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को ख़तरनाक व्यवसायों में काम नहीं दिया जा सकता है. क्या इसका ये अर्थ है कि ग़ैर-ख़तरनाक कामों में दो साल के बच्चों को लगाया जा सकता है?"
उन्होंने बताया, "जाहिर है कि ये काफ़ी पुराना है. अब इस मुद्दे को उठाया गया है और संसद में एक संशोधन लंबित है. हालांकि ये संशोधन काफी समय से लटका हुआ है."
अगर क़ानून में बदलाव होता है तो बच्चों के अपहरण के खिलाफ लड़ाई थोड़ी आसान हो जाएगी.
लेकिन क्या सिर्फ क़ानून में एक बदलाव करने से हालात बदल जाएंगे?       

Comments

  1. Baccarat – a fun gambling game that has nothing to do with
    The game takes place in 바카라 사이트 a casino. You 카지노 have to play through a wide array of bets videodl.cc that can be placed on a regular basis. Players can also

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

लोक विराट पुरुष

लोक  विराट पुरुष हजारों साल पहले भारत की मेधा ने विराट-पुरुष की संकल्पना की थी >.. जो सहस्रशीर्ष है , सहस्रनेत्र है , सहस्रबाहु है , सहस्रपाद है ।उसमें कोटि-कोटि युगों का अन्तर्भाव है ।विभिन्न जाति, वर्ग, वर्ण , धर्म आदि उसके हाथ-पैर, नाक-कान -आंख ,पेट इत्यादि अंग-प्रत्यंग हैं परन्तु वे सभी अंग अविच्छिन्न हैं और एक-दूसरे के लिये हैं । वे सब के लिये सब हैं ।इस >सब < के बीच जो नाम-रूप का भेद और असमानता है, वह दृश्यमान है, तात्विक नहीं ।उसकी एकात्मसत्ता ही सर्वजन सत्ता है , जिसे हम लोक कहते हैं । व्यक्ति, वर्ग, राज्य आदि आज हैं किन्तु लोक कल भी था , आज भी है और कल भी रहेगा ॥ वह निरन्तरता है । राजेन्द्र चतुर्वेदी 

किशोरी रूबी का गाँव क्या बाल श्रम और टीबी रोग से मुक्त हो सकता है?क्या बच्चा चोर बलवा काण्ड की सी आई डी जांच हो सकती है?

                                                                   सेवा में  माननीय मुख्य मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार लखनऊ            विषय  - किशोरी रूबी का  गाँव  क्या बाल श्रम और टीबी रोग से मुक्त हो सकता है?                        क्या बच्चा चोर बलवा काण्ड की सी आई डी जांच हो सकती है? क्या                        नई दुनिया आदिवासी बस्ती की महिलाओ द्वारा १४ -११ ०१५ को आपको                        दिए ज्ञापन पर आप सुनवाई कर सकते है ताकि आप निर्बल के मसीहा दिखे...

लोक सत्संग कार्यक्रम

विश्व अहिंसा दिवस एवं महात्मा गांधी के जन्मदिवस 2 अक्टूबर 2023  से नवाचार के तहत सर्वोदय सेवा आश्रम द्वारा बुंदेलखंड के चित्रकूट जनपद में लोक सत्संग कार्यक्रम का शुभारंभ किया  गया। लोक सत्संग क्या है? संयुक्त राष्ट्र संघ (United nation )द्वारा पूरे विश्व के कल्याण हेतु 17 सतत विकास लक्ष्यों /उद्देश्य निर्धारित  किए हैं।  सामुदायिक संगठन सर्वोदय सेवा आश्रम चित्रकूट अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए 17 सतत विकास लक्ष्यो के द्वारा लोक कल्याण को महत्वपूर्ण मानता है। भारत की सरकार ने 17 सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विशेष कार्यक्रम योजनाएं ग्राम पंचायत स्तर से लेकर जिले स्तर तक में निर्धारित की गई है उनका क्रियान्वयन कराया जा  रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ और भारत सरकार दोनों के द्वारा लोक कल्याण के लिए जो कार्य किया जा रहे हैं उनकी स्थिति पारिवारिक एवं सामुदायिक स्तर कितनी प्रभावित है और बदलाव कहां कितना है इस सत्य को जानना सबसे जरूरी है।  यदि कहीं रुकावटें हैं तो उनको कैसे सामुदायिक ,लाभार्थी तथा सरकार की सहभागिता से कैसे दूर किया जा सकता है इसके लि...