1971 में पश्चिम बंगाल के 24 परगना ज़िले के हंसपुकुर गांव में दिहाड़ी मज़दूर सधान मिस्त्री की डायरिया से मौत हो गई. पत्नी शुभाषिनी पर चार छोटे-छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी आ गई और पास में थे महज़ 75 पैसे. लेकिन शुभाषिनी ने उसी दिन सोच लिया कि ग़रीब आदमी की इलाज ना मिलने की वजह से मौत नहीं होनी चाहिए. उन्होंने दिहाड़ी मज़दूरी कर अपने बेटे को डॉक्टर बनाया और बेटे के साथ मिलकर गांव के ग़रीब लोगों के लिए हंसपुकुर गांव में 1993 में ह्युमैनिटी अस्पताल बनाया. एक अस्पताल पर ज़्यादा दबाव पड़ने लगा तो आम लोगों की मदद से शांतिगाछी में दूसरा अस्पताल बनाया गया. शुभाषिनी 70 साल को पार कर चुकी हैं लेकिन हर ग़रीब तक इलाज़ पहुंचाने के मिशन में अब भी जुटी हैं.
चित्रकूट की जल विरासतें - जहाँ वृक्ष ही जल का मंदिर है। मंदाकिनी, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी और विलुप्त हो रहे कुंड-बावड़ियों का पुनर्जीवन। कंक्रीट के घाट नहीं, वट-पीपल- अर्जुन बरगद के जीवित घाट और वृक्ष मंदिर ही हमारी जल संस्कृति को बचाएंगे। जल है तो तपोवन है।स्वास्थ्य तभी टिकाऊ होगा जब जल वायु और मिटटी स्वास्थ्य होगी। आने वाली पीढ़ी के सपने तभी स्वीकार होंगे।