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Showing posts from November, 2015

शुभाशिनी मिस्त्री- महज़ 75 पैसे में ह्युमैनिटी अस्पताल बनाया.

1971 में पश्चिम बंगाल के 24 परगना ज़िले के हंसपुकुर गांव में दिहाड़ी मज़दूर सधान मिस्त्री की डायरिया से मौत हो गई. पत्नी शुभाषिनी पर चार छोटे-छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी आ गई और पास में थे महज़ 75 पैसे. लेकिन शुभाषिनी ने उसी दिन सोच लिया कि ग़रीब आदमी की इलाज ना मिलने की वजह से मौत नहीं होनी चाहिए. उन्होंने दिहाड़ी मज़दूरी कर अपने बेटे को डॉक्टर बनाया और बेटे के साथ मिलकर गांव के ग़रीब लोगों के लिए हंसपुकुर गांव में 1993 में  ह्युमैनिटी अस्पताल  बनाया. एक अस्पताल पर ज़्यादा दबाव पड़ने लगा तो आम लोगों की मदद से शांतिगाछी में दूसरा अस्पताल बनाया गया. शुभाषिनी 70 साल को पार कर चुकी हैं लेकिन हर ग़रीब तक इलाज़ पहुंचाने के मिशन में अब भी जुटी हैं.

ज्ञारसी बाई सहारिया आदिवासी समुदाय के बंधुआ मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं.---

ज्ञारसी बाई ×   राजस्थान के बारन ज़िले में ज्ञारसी बाई बीते दो दशक से सहारिया आदिवासी समुदाय के बंधुआ मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं. ज्ञारसी ख़ुद कभी स्कूल नहीं गईं और उनके पिता एवं पति भी दिहाड़ी मज़दूर हैं. लेकिन इससे ज्ञारसी बाई की हौसले में कोई कमी नहीं आई. दो दशक के सफ़र में ज्ञारसी बाई ने महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार के ख़िलाफ़ हमेशा आवाज़ उठाई है. उन्होंने अपने समुदाय की महिलाओं में जागरूकता के स्तर को बढ़ाया है. ज्ञारसी बाई ने सहारिया आदिवासी समुदाय की लड़कियों को पढ़ने लिखने के लिए प्रेरित किया. उनकी संस्था ‘जागृत महिला संगठन’ का आदिवासी महिलाओं को सशक्त करने में अहम योगदान रहा है.

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कृति भारती जोधपुर की 28 वर्षीय कृति भारती बाल विवाह मुक्त राजस्थान के लिए काम कर रही हैं. देश में पहली बार किसी बाल विवाह को का नूनन निरस्त करवाने की उनकी उपलब्धि 2013 में ‘लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स’ और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में भी दर्ज की गई है. बाल विवाह रुकवाने और और कानूनन निरस्त करवाने की मुहिम में उनपर कई बार हमले भी हुए हैं, लेकिन उनके हौसले कायम हैं. कृति ने 2013 में  ‘सारथी ट्रस्ट’  की स्थापना की और बाल संरक्षण और सुरक्षा पर पीएचडी भी कर रही हैं. कृति को मारवाड़ रत्न, महाराणा मेवाड़, वीर दुर्गादास राठौड़ सम्मान सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं. कृति अपनी माँ के साथ रहती हैं जिन्होंने उन्हें अकेले पाल-पोस कर बड़ा किया.
असम की जाह्नवी 17 साल की उम्र में एचआईवी से संक्रमित हो गईं थी. यह संक्रमण उनतक उनके पति से पहुंचा था और डॉक्टरों के मुताबिक वे महज़ तीन महीने की मेहमान थीं. आज जाह्नवी 36 साल की हैं और एड्स के ख़िलाफ़ मुहिम चला रही हैं. उनके पति और दो साल की बच्ची की तो मौत हो गई, लेकिन जाह्नवी ने दुनिया को एपने एचआईवी पॉजिटिव होने के बारे में बताया और दूसरे लोगों के लिए उम्मीद की रोशनी बन गईं. उन्होंने 2002 में ‘ असम नेटवर्क ऑफ़ पॉजिटिव पीपल ’ नामक संस्था शुरू की. यह संस्था एड्स पीड़ितों के लिए मुफ़्त में काउंसलिंग का काम करती हैं. इस नेटवर्क के 50 सक्रिय सदस्य हैं जो एचआईवी और एड्स पीड़ितों की देखभाल का काम देखती है.

बाल श्रम टी बी उन्मूलन जन सुनवाई व्यास कुण्ड चित्रकूट - २३ अक्टूबर ०१५

                                                            बाल श्रम टी बी उन्मूलन  पर रिपोर्ट                                                                                             childline Team दिनांक १० अगस्त २०१५ को  सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष श्री मधसूदन भाई तथा चित्रकूट चाइल्ड् लाइन टीम  के साथ चित्रकूट जनपद की अकबर पुर ग्राम पंचायत की नई दुनिया आदिवासी बस्ती पहुंचे ही थे कि- इस बस्ती  की कई महिलाओ ने घेर कर सवाल पूछना शुरू  दिया। इनमे किशोरिया  बच्चे  तथा पुरुष भी थे।महिलाये रो रो कर कह रही थी कि  पुलिस ह...