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समेकित बाल संरक्षण योजना की सक्रियता हेतु कार्यशाला


 सिसकियाँ लेती समेकित बाल  संरक्षण योजना  


भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश में बच्चों की स्थिति ठीक नहीं है. अरबों के बजट और सरकारी दावों के बावजूद लाखों बच्चे खुले आसमान में जिंदगी बसर करने, बाल श्रम करने और शिक्षा के अधिकार से वंचित हैं।संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार कनवेंशन के मुताबिक यह सभी देशों-सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे बाल अधिकारों की सुरक्षा करें और बच्चों को मुश्किल हालात से बाहर निकालें। यूनिसेफ की चीफ एन्ना वेनमैन ने हाल ही में बाल अधिकारों की बुरी स्थिति पर टिप्पणी की है। वेनमैन के अनुसार, यदि किसी समाज के इतने छोटे बच्चों का जबरन बाल विवाह, सैक्स वर्कर के तौर पर शोषण किया जाएगा और उन्हें मूल अधिकारों से वंचित किया जाएगा, तो वह समाज तरक्की नहीं कर सकता। बच्चों के अधिकारों के हनन की गंभीरता को समझना पहला कदम है, ताकि एक ऐसा माहौल बनाया जा सके जहां बच्चे सुरक्षित हों और उनकी क्षमताओं का पूर्ण विकास करने में मदद मिल सके।
उत्तर प्रदेश में बाल लिंग अनुपात (चाइल्ड सेक्स रेशियो) राष्ट्रीय अनुपात की तुलना में कम है। पश्चिमी उप्र के विभिन्न इलाकों की दशा इस मामले में पूर्वी उप्र की अपेक्षा ज्यादा खराब है हालांकि पिछले दस सालों पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह अनुपात तेजी के साथ घटा है। भारत में बच्चों के साथ लगातार जुर्म बढ़ता जा रहा है। उनकी हत्या, भ्रूण हत्या, अपहरण, खरीद-फरोख्त, मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति तथा बाल श्रम की समस्याएं प्रमुख हैं. वर्ष 2007 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा किए गये एक अध्ययन में यह तथ्य उजागर हुआ कि भारत में प्रत्येक दो बच्चे पर एक बच्चे का यौन शोषण होता है, जबकि हमारे यहां बच्चों के प्रति जुर्म रोकने के लिए पहले से ही हर तरह के नियम कानून विद्यमान हैं।
बुंदेलखंड में बच्चो की स्थित और भी दयनीय है। प्राकृतिक संसाधनो पर आश्रित आदिवासी समाज जिसके पास जगल में रहने और उसके साथ जीवन जीने का जो ज्ञान था वह अब मूल्य हीन हो गया। विगत १०० वर्षो से जंगलो का कटान जारी है।इस समाज के बच्चे आज भी अशिक्षा का डॅन्स झेल रहे है। पथरो से लड़नेवालेसमाज  में युवाओ को सिल्कोशिश यानि टीबी बड़ी जल्दी होती है। इनके अधिकांश परिवारो में बच्चे लम्बे समय तक भूख सहने के आदि होते है। बरगढ़ की फूलबानो ने गरीबी से लड़ाई लड़ कर इंटर पास किया और उसने ठाना कि बरगढ़ से कि बच्चो की गरीबी को हम सब बच्चे मिलकर दूर करेंगे। बाल आवाज को बड़ी आवाज बनाने वाले बच्चे रामानंद ,बासु ,हिमांशु तथा  विजय मौर्य सहित कुछ बच्चो ने २०११ में अपना बाल धमाका    अखबार निकला और अपने मित्रो की दशा दिशा को सुधारने की  बड़ी  आवाज बनाई। लेकिन इस समाज में अखबार का असर नहीं दिखा जब कि इस अखवार का उद्घाटन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री श्री दद्दू प्रसाद ने किया था।बच्चो की आवाज को प्यार से सुनने  और उसे सम्मान देने की क्षमताये परिवार और समाज में नहीं है। 
बुंदेलखंड के सभी गाँवो में परेशान और कर्ज बीमारी से लाचार परिवारो में बच्चो की स्थित और भी दयनीय है। इनके बच्चे स्कूलों से दूर है। परिवारो के अंदर कलह और समस्याओ के कारन बच्चो को अनावश्यक गाली के मार झेलनी पड़ती है इतना ही नहीं माता पिता यदि गंभीर बीमारी से ग्रस्त है तो उन्हें कम उम्र में काम करने को मजबूर होना पड़ता है। बुंदेलखंड के गरीब परिवारो में अनाथ बच्चो की संख्या बढ़ रही है। मैंने छिटैनी गांव में दो युवा माता पिता जो टीबी से ग्रसित हो कर बच्चो की भूख शांत करने के लिए  मनरेगा में काम करने जाते थे किन्तु उनकी दवा पैसे के आभाव में नहीं हो सकी। मनरेगा में मजदूरी के लिए लम्बी प्रतीक्षा करना उनके बस की बात नहीं थी और एक-एक कर दोनों मर गए उनके बच्चे किसी तरह बड़े भाई को पालने पड़ रहे है। 
चित्रकूट जनपद में किसानो और मजदूरो कीआत्महत्याएं नहीं दिखती किन्तु बुंदेलखंड के बाँदा महोबा हमीरपुर में बड़ी संख्या में किसानो ने आत्महत्याएं की। जब माता पिता आत्महत्या जैसे समाधान को स्वीकार कर लेते है तब बच्चो के सामने जीवन जीने की मजबूत आशा क्या हो सकती है। चित्रकूट में किसानो मजदूरो को जीवन देने की ताकत यंहा केबचे  जंगलो और पानी ने दी है -किन्तु इसके बावजूद यहाँ के बच्चे आभाव में ,गन्दी आदतो के शिकार हो चुके है। गाँवो में नशा और सेक्श फिल्मे बड़ी संख्या में गरीब परिवारो में विद्द्य्मान है जिसका कारण कि किशोरिया बहकावे में आकर घर से भागती और इसके बाद की कहानी तो मार्मिक होती है। गुलाबी गैंग की संपत पाल और महिला शांति सेना की सावित्री रानी ने लड़कियों की व्यथा सुनाई थी। 
फूलबानो ,हिमांशु रामानंद तथा बासू सहित गांव के लोगो ने मिलकर  बच्चो की दशा दिशा जानने हेतु  चित्रकूट जनपद के मऊ विकास खंड की  बरगढ़ न्याय पंचायत के ४० गाँवो/हेमलेट्स के गरीब वार्डो में ग्रामीणो की सहभागिता से बच्चो की स्थितियों का आंकलन किया।समाज से प्राप्त जानकारियो से पता चला कि प्रसव के तुरंत बाद ५ बच्चे तथा ६ माताये की मृत्यु होगयी ,९८१ बच्चे आंगनवाड़ी में नामांकित है किन्तु जाने वाले बच्चे मात्र २५९ है। ३९ बच्चे रतौंधी के शिकार है। ७४ माताये अतिकुपोषित है और ५७ बच्चे कुपोषण से ग्रसित है। १४० बच्चे बाल श्रमिक है जिनमे से अधिकांश खतरनाक कामो में लगे है। ड्राप आउट ९२ है किन्तु अनियमित ८१३ है। गंभीर बीमारी से ग्रसित बच्चो की संख्या १५ है और १८ बच्चे अनाथ है २१ बच्चे विकलांग है। एक अच्छी खबर है कि १८ बच्चे सामाजिक मुद्दो पर अगुवाकर्ता है। 
हम इस निष्कर्ष पर पंहुचे है कि यदि ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समिति सक्रीय होती और वह इनकी अच्छी पैरवी करती तो निदसंदेह वंचित असहाय बच्चो को सरकारी मदद मिलती।यदि मदद में कही लापरवाही दिखती तो बच्चो की अदालत जिसे सविधान के तहत न्यायलय माना गया है -जिसका नाम बाल कल्याण समिति है वहां मुक़दमा पंजीकृत होता। जब मैंने बाल कल्याण के अध्यक्ष भाई महेश प्रसाद मिश्रा से मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि तीन माह पहले लावारिश नवजात का केश मात्र दर्ज हुवा था वह भी न्यायालय द्वारा निर्णीत नहीं हुवा। बच्चो की रक्षा और संरक्षण हेतु संविधान  दवारा  मान्य और सरकार द्वारा निर्मित बाल संरक्षण संस्थाए अभी तक अस्तित्व में नहीं दिखती जिसका मुख्य कारण है राजनैतिक इच्छा शक्ति का कमजोर होना।
 मैंने उक्त के सम्बन्ध में चित्रकूट के जिला पंचायत अध्यक्ष श्री शिव शंकर यादव ,चित्रकूट सांसद भाई भैरो प्रसाद जी से बात की सभी ने मुझे इस मुद्दे में प्रबल सहयोग देने की बात की। चित्रकूट की जिलाधिकारी ,मुख्यविकस अधिकारी ने पूर्ण सहयोग देने की बात की तथा पुलिस अधीक्षक श्री एस किरण ने कार्यशाला में भागीदारी की बात की। समेकित बाल संरक्षण योजना की सक्रियता हेतु दिनांक २४ जून २०१४ को आयोजित होने वाली कार्यशाला से सभी प्रेरित होगे।   हमें विश्वास है चित्रकूट में राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ साथ सामाजिक संस्थाए और युवा सामाजिक जिम्मेदारियों को समझेगे और बच्चो के संरक्षण में सबकी अगुवाई एक साथ दिखेगी। 

आपका
अभिमन्यु भाई
सर्वोदय सेवा आश्रम 
चित्रकूट 







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