बंद करो अख़बार पढ़ना यह केवल मौत पढ़ाता है।
अख़बार के समाचारो में -मौत /बलात्कार की खबरे सबसे अधिक है जो सभी अखबारों में नित्य आरही है। गांव के रामकृपाल चाचा एक दिन जोर से बोले बंद करो अख़बार पढ़ना यह केवल मौत पढ़ाता है। यह खबरे -अफगानिस्तान /पाकिस्तान /गाजा /इराक /नाइजीरिया से नहीं बल्कि भारत के शहरों /गाँवो /मुहल्लों से है जन्हा बच्चे ही असुरक्षित और दुश्मनियो के शिकार है।परिवारो के अंदर माता- पिता /भाई -बहन /चाचा -आदि के बीच बच्चे / सुरक्षित नहीं है। असमय मौत /और बलात्कार तथा दिन में लम्बे समय तक भूख सहने और माता पिता की आकस्मिक मृत्यु /आत्महत्या अथवा बीमारी में कठोर श्रम करने वाले बच्चे ---बच्चे है। संसार में युद्धों का इतिहास बच्चो और माताओ के लिए दर्द नाक रहा है और आज भी युद्ध जारी है किन्तु प्राक्रतिक सामाजिक आपदाओ से उत्पन्न समस्याओ के परिणाम युद्धों जैसे ही दिखते है। अंतर इतना है कि युद्ध -देश -देश के बीच होते है राजनैतिक प्रतिष्ठाये और प्रबल होती है।भारत के अंदर गरीबी -अमीरी का अघोषित युद्ध चल रहा है।
दो दिन पहले इजराइल ने गाजा के ऊपर बम्ब गिराये-कारण था उसके २ नागरिको को फिलिस्तीनी चरम पंथियों ने सर कलम कर दिया था। वर्चस्व की लड़ाई में हिंसा का सहारा लेने वाले चरम पंथियों की संख्या पूरे फिलिस्तीन में कम होगी किन्तु --युद्ध भड़काने वाले कामो से जो कुछ गाजा में चल रहा है वह दुनिया के सामने है। इस बमबारी में करीब १००० लोग सेकेंडो में मर गए। सूचनाओ के अनुसार मरने वालो में निर्दोष बच्चे माताएं अधिक है।इराक में भी घमाशान है निर्दोष लोग सबसे अधिक मारे जा रहे है। अनाथ बच्चो की संख्या बढ़ रही है।भारत में आत्महत्याएं करने वाले माता पिताओ के बच्चे बड़ी संख्या में अनाथ है।
वर्ष १९८० से लेकर अब तक की सरकारों राजनैतिक पार्टियो ने जिस विकास को स्वीकारा है उसमे से समाज वाद /गांधीवाद /लेनिन वाद सब लापता हो गया है। केवल चरित्रहीनता और मनी (धन ) वाद दिखता है। जिसका परिणाम है कि धन आधारित सामाजिक समरसता ही चारो ओर दिख रही है। यदि कोई धन से कमजोर है उसे अब पारिवारिक सामाजिक मदद नहीं मिलती सरकारी मदद तो तेरहवी के बाद भी नहीं आती। बुंदेलखंड के समाज के समस्याग्रस्त लोग आपदाओ से अकेले जूझते हुवे फांसी में झूल जाते है। मौत अंतिम समाधान है समाज ने स्वीकार कर लिया क्यों ?इस पर किसी विश्विद्द्यालय ने खोज पर अध्य्यन नहीं कराया ? पंजाब विधर्भ के किसानो ने भी यही रास्ता अपनाया।
सामाजिक /राजनैतिक व्यवहारों अथवा आदतो में लोकतंत्र संवाद विहीन है। वोट देने के बाद समाज ने आवाज निकालना ही बंद कर दिया। बोकारो झारखंड की पंचायत के पंच ने अपने निर्णय से १० वर्ष की निर्दोष बालिका का बलात्कार कराया पूरा समाज पंच के विरोध में नहीं जा सकता। राजनैतिक दल वोट लेने की लिए इन्ही को सलाम करते है।भारत के गरीब क्षेत्रो में समाज के अंदर जो एक जुटता थी और आपदाओ से लड़ने की शक्तिया थी उसे सरकारों की वित्त नीतियों /ग्रामीण विकास की स्वर्णजयंती रोजगार योजना /डवकरा सहित वन तथा राजस्व विभाग के कारनामो ने नष्ट कर दिया। गाँवो में अशांति के आलावा कुछ नहीं दिखता। मैंने नजदीक से गाँवो के परिवारो के अंदर की कलह महसूस की। हंसी लापता है। आज भारत के लोग आतंरिक मौन युद्ध झेल रहे है। बुंदेलखंड किसानो ने आत्महत्याएं तो कर ली किन्तु उनके अनाथ बच्चे आभाव में अशिक्षा में जी रहे है। इस पर सभी राजनैतिक दल शांत है क्यों कि काम पाकिस्तान की सीमा में नहीं हुवा ?कोई आवाज नहीं आई। भारत में आतंरिक युद्ध चल रहा है---आप माने य न माने। यह युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक समाज के अंदर आपदाओ से लड़ने ताकत पुनः वापस नहीं आती।
बुंदेलखंड शांति सैनिक

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