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          जल न्याय से पीड़ित मंदाकनी नदी की देन जल  सत्याग्रह  
२५ जुलाई २०२६: वह काली दोपहर और इंटेकवेल की दुर्दशा
२५ जुलाई २०२६ को मेरा मन बहुत अधिक व्याकुल और बेचैन था। मैं घर से निकला और सीधे उस तट पर पहुँचा जिसे लोकभाषा में 'इमली घाट' और वर्तमान में 'राजा घाट' कहा जाता है। मैंने नदी तट पर जाकर हमेशा की तरह सबसे पहले नदी के जल को अपने माथे से लगाया, लेकिन उस दिन पानी में बदबू बहुत अधिक थी। नदी में कोई बहाव नहीं था, वह पूरी तरह स्थिर थी।
इसी राजा घाट पर चित्रकूट नगर के घरों, गाँवों और यहाँ आने वाले लाखों तीर्थयात्रियों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने वर्ष १९७४ में नदी की जलधारा से जोड़कर एक कुआँ बनाया था, जिसे तकनीकी भाषा में 'इंटेकवेल' (Intake Well) कहते हैं। यह इंटेकवेल यहाँ से २४ घंटे नगर को पेयजल की आपूर्ति भेजता है। विडंबना देखिए कि इसी घाट पर बनी राजा कॉलोनी का मुख्य गंदा सीवर नाला सीधे इसी इंटेकवेल के मुँह पर गिरता है।
मैं उस दिन मौन होकर नदी को निहारता रहा और उसकी अदृश्य आवाज़ को सुनने की कोशिश करता रहा। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे नदी मुझसे कह रही हो— "अभिमन्यु, मेरा अस्तित्व अब समाप्त होने वाला है। मैं एक ही जगह रुककर, सड़-सड़ कर अब पूरी तरह थक चुकी हूँ।" पयस्विनी-मंदाकिनी की इस बेचैनी ने मेरी आत्मा को गहरी पीड़ा दी। मैं लगातार रोज़ वहां जाने लगा। इसी बीच अचानक मैंने देखा कि पेयजल इंटेकवेल के बिल्कुल पास मरे हुए जानवर पानी में तैर रहे थे और सड़ रहे थे। मुझे यह देखकर भयंकर मानसिक आघात लगा कि नदी के प्रति जो भी जिम्मेदार और संवैधानिक लोक सेवक (अधिकारी) हैं, वे कभी इस दर्द को निहारने नदी तट पर नहीं आते।नगर पालिका कर्वी 2011 में 10,250 घरों को पानी देती थी, अब 2026 में लगभग 84 हजार आबादी को पानी देना है।"
महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय में पर्यावरण विभाग के प्रोफ़ेसर श्री घनश्याम  गुप्ता ने अपने अध्य्यन के आधार पर बतया कि  ​1993 के पहले रामघाट में मई जून में पयस्वनी /मंदाकनी नदी का प्रवाह 3000 लीटर प्रति सेकण्ड था. जुलाई 2026 में 50 लीटर प्रति सेकेण्ड भी फ्लो इंटेक वेल के पास नहीं है जिसके कारण मरे पशु या गन्दगी जो नदी में समाज और सीवर द्वारा फेंकी जाती है सभी - इंटेक वेल में लगी मोटरें उसे खींच लेती है।  इसीलिए मरे जानवर इंटेक वेल के पास रहते है।  तब सवाल है कि -- जब पानी पीने के लिए कम है तब नगर पालिका लोगो को बीमार पानी पिलाने के अलावा क्या करेगी।  सबसे अधिक सीवर नाले नदियों तालाबों में नगर पालिका ने   सीधे लगाए है। सिचाई विभाग भी पानी दोहन और नदी को बांधने में लगा है।  नदियों की हत्या में सरकारी योजनाएं और सोच है।   
✊ जल संवाद से आमरण अनशन तक: ७ अगस्त २०२६
मैंने नदी के इस असहनीय दर्द को फेसबुक पर डाला और 1 अगस्त 2026 को 'नदी जल संवाद' के लिए एक भावुक पोस्ट लिखी। मेरी उस पुकार को पढ़कर श्री रवि श्रीवास्तव, मुन्नू लाल पांडेय, श्री सुरेश प्रसाद त्रिपाठी, श्री भूपेंद्र पटेल, वंदना दीदी और रवि पटेल राजा घाट पर 2/8/2026  को  एकत्र हुए। प्रदूषित नदी के किनारे हमारा जल संवाद हुआ। पानी में सड़ते मरे हुए जानवरों को देखकर सभी साथी भीतर तक विचलित हो उठे। सभी ने एक स्वर में कहा कि अब 'सत्याग्रह और उपवास' ही एकमात्र रास्ता बचा है। मैंने उनसे कहा कि हमारा सत्याग्रह तो वर्ष २०२२ से अनवरत चल रहा है, लेकिन सरकार ने समय-समय पर जो भी लिखकर दिया, उसे आज तक धरातल पर पूरा नहीं किया। तभी हमारी टीम के ऊर्जावान युवा भूपेंद्र सिंह ने दृढ़ता से कहा— "भैया, अब इस बार मैं सीधे आमरण अनशन पर बैठूँगा।"


अगले ही दिन, ३ अगस्त २०२६ को हमने तत्कालीन जिलाधिकारी चित्रकूट श्री पुलकित गर्ग जी को नदी के इस दर्द के निवारण हेतु एक विस्तृत मांग पत्र सौंपा। जब निर्धारित समय में कोई समाधान नहीं हुआ, तो तय रणनीति के अनुसार दिनांक ७ अगस्त २०२६ को प्रातः १०:०० बजे मैंने, भूपेंद्र सिंह और रवि पटेल ने मिलकर माँ नदी की वैदिक पूजा-अर्चना और प्रार्थना की। इसके तुरंत बाद, युवा सामाजिक चिंतक भूपेंद्र सिंह ऐतिहासिक आमरण अनशन पर बैठ गए और हमारी पूरी टीम क्रमिक उपवास पर बैठ गई।
🤝         ८ अगस्त २०२६: नैतिक शक्तियों की विजय
आंदोलन के अभूतपूर्व नैतिक दबाव के कारण, अनशन के दूसरे ही दिन ८ अगस्त २०२६ को जिला प्रशासन की ओर से उप जिलाधिकारी (SDM) कर्वी श्री अजय कुमार यादव तथा उप पुलिस अधीक्षक (CO) कर्वी कई वरिष्ठ विभागीय अधिकारियों के साथ भारी पुलिस बल लेकर अनशन स्थल पर पहुँचे। उन्होंने बेहद संवेदनशीलता दिखाते हुए जल प्रहरियों के बीच कहा कि— "शासन-प्रशासन ने आपकी सभी जायज मांगें पूरी तरह मान ली हैं, कृपया अब आप अपना अनशन समाप्त कर दीजिए।"

इसके बाद उप जिलाधिकारी ने स्वयं अपने पेन से लिखित आश्वासन दिया, जिसमें ₹९२.९९ करोड़ की एसटीपी योजना, ११ गाँवों का राजस्व सीमांकन और इंटेकवेल की सुरक्षा के पुख्ता निर्देश शामिल थे, जिसके बाद यह अनशन सफलतापूर्वक समाप्त हुआ।

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