भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश में बच्चों की स्थिति ठीक नहीं है. अरबों के बजट और सरकारी दावों के बावजूद लाखों बच्चे खुले आसमान में जिंदगी बसर करने, बाल श्रम करने और शिक्षा के अधिकार से वंचित हैं।संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार कनवेंशन के मुताबिक यह सभी देशों-सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे बाल अधिकारों की सुरक्षा करें और बच्चों को मुश्किल हालात से बाहर निकालें। यूनिसेफ की चीफ एन्ना वेनमैन ने हाल ही में बाल अधिकारों की बुरी स्थिति पर टिप्पणी की है। वेनमैन के अनुसार, यदि किसी समाज के इतने छोटे बच्चों का जबरन बाल विवाह, सैक्स वर्कर के तौर पर शोषण किया जाएगा और उन्हें मूल अधिकारों से वंचित किया जाएगा, तो वह समाज तरक्की नहीं कर सकता। बच्चों के अधिकारों के हनन की गंभीरता को समझना पहला कदम है, ताकि एक ऐसा माहौल बनाया जा सके जहां बच्चे सुरक्षित हों और उनकी क्षमताओं का पूर्ण विकास करने में मदद मिल सके।
सोशल एक्टिविस्ट डॉ. इमरान खां के अनुसार, ‘अनुमान है कि देश में करीब चार करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिनके अधिकारों एवं हितों की सुरक्षा करने की सख्त जरूरत है. गैर सरकारी संगठन इसको लेकर काम भी कर रहे हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।’ इमरान कहते हैं देश की राजधानी दिल्ली में ही करीब पांच लाख बच्चों अपने बचपन को दांव पर लगाने एवं चुनौतीपूर्ण माहौल में रहने को विवश हैं. यही नहीं एक लाख से अधिक बच्चों के सिर पर छत नहीं है. सरकारी स्तर पर ऐसा कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य डॉ. योगेश कुमार दुबे भी देश में बाल अधिकारों को लेकर बहुत कुछ किए जाने की जरूरत महसूस करते हैं। दूबे के अनुसार, इसमें काम करने वाले लोगों को अधिक पेशेवर होना पड़ेगा। यह सत्य है कि भारत के 3 करोड़ बच्चों में से, बहुत-से बच्चे ऐसी आर्थिक एवं सामाजिक वातावरण में रहते हैं जो उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधा पहुंचाते हैं. बच्चे और काम, बालश्रम की समस्या से निपटना, लिंग भेद उन्मूलन, फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों का उत्थान, विकलांग बच्चों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करना एवं हर बच्चे को उसके आधारभूत अधिकार के रूप में शिक्षा प्रदान करना आदि बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर फिलहाल बहुत काम करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
बाल शोषण आधुनिक समाज का एक विकृत और खौफनाक सच बन चुका है। हाल में देश में पहली बार बाल शोषण के मामलों की गहराई से जांच-पड़ताल के लिए केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा यूनीसेफ के सहयोग से 13 राज्यों में इस बारे में अध्ययन करवाया गया है। अध्ययन में कई संवेदनशील तथ्य सामने आए हैं। यह पहला मौका है, जब सरकार ने इतने विस्तृत पैमाने पर बाल शोषण के विवादित मसले पर कोई पहल की है. अध्ययन से जो बात सबसे ज्यादा उभर कर सामने आई है, वह यह है कि 5 से 12 साल तक की उम्र के बच्चे बाल शोषण के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। हैरत की बात यह है कि हर तीन में से दो बच्चे कभी न कभी शोषण का शिकार रहे हैं. अध्ययन के दौरान लगभग 53.22 प्रतिशत बच्चों ने किसी न किसी तरह के शारीरिक शोषण की बात स्वीकारी, तो 21.90 प्रतिशत बच्चों को भयंकर शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। इतना ही नहीं, करीब 50.76 प्रतिशत बच्चों ने एक या दूसरे तरह की शारीरिक प्रताड़ना की बात कबूली।
मंत्रालय की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक देश का हर दूसरा बच्चा भावनात्मक शोषण का भी शिकार है. आमतौर पर माना जाता है कि बाल शोषण का मतलब बच्चों के साथ शारीरिक या भावनात्मक दुव्र्यवहार है, लेकिन सीडीसी (कंसलटेंसी डेवलपमेंट सेंटर) के अनुसार, बच्चे के माता-पिता या अभिभावक द्वारा किया गया हर ऐसा काम बाल शोषण के दायरे में आता है, जिससे उसके ऊपर बुरा प्रभाव पड़ता हो या ऐसा होने की आशंका हो या जिससे बच्चा मानसिक रूप से भी प्रताड़ित महसूस करता हो।
भारत में हालत ऐसी है कि अक्सर बाल शोषण के वजूद को ही को सिरे से नकार दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि खामोश रहकर हम बच्चों के साथ दुव्र्यवहार की वारदातों को बढ़ावा ही दे रहे हैं। दुनियाभर से बाल श्रम को खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम संगठन और 144 देशों ने बच्चों के अधिकारों के लिए एक प्रोटोकॉल बनाया है। इस प्रोटोकॉल का अनुमोदन करने वाले देश को अपनी सीमा में बच्चों की बिक्री, बाल वेश्यावृत्ति और बच्चों की पॉर्नोग्राफी पर पूर्ण रोक लगानी होती है. इन सभी को अपराध की श्रेणी में शामिल करना होता है, मगर भारत ने अभी तक इस प्रोटोकॉल का अनुमोदन नहीं किया है।
हाल ही पाकिस्तान ने भी बाल अधिकारों पर सम्मेलन के वैकल्पिक प्रोटोकॉल का अनुमोदन कर दिया है. ऐसा करने वाला वह दुनिया का 144वां देश बन गया है. बाल श्रम के क्षेत्र में सक्रिय गैर सरकारी संगठनों के मुताबिक दिसंबर वर्ष 2010 तक हमारे देश में करीब 6 करोड़ बाल श्रमिक हैं. इनमें से करीब एक करोड़ बच्चे बंधुआ मजदूर हैं। इस एक करोड़ में से 50 लाख तो बंधुआ मजदूरों के बच्चे होने के कारण जन्म से ही बंधुआ मजदूर हैं, जबकि शेष 50 लाख औद्यौगिक ईकाइयों में काम करने वाले बच्चे हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग की बेवसाइट पर मौजूद वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार देश में बाल श्रमिकों की संख्या 1.27 करोड़ है। इसमें बंधुआ सहित तमाम तरह के बाल श्रमिक शामिल हैं। देश में राष्ट्रीय बाल आयोग के अलावा दिल्ली एवं बिहार सहित केवल नौ राज्यों में बाल अधिकार आयोग हैं मगर पर्याप्त शक्तियां नहीं होने के कारण यह आयोग प्रभावहीन साबित हो रहे हैं।
देश में बच्चों के साथ लगातार जुर्म और अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है. उनकी हत्या, भ्रूण हत्या, अपहरण, खरीद-फरोख्त, मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति तथा बाल श्रम की समस्याएं प्रमुख हैं। वर्ष 2007 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा किए गये एक अध्ययन में यह तथ्य उजागर हुआ कि भारत में प्रत्येक दो बच्चे पर एक बच्चे का यौन शोषण होता है। जबकि हमारे यहां बच्चों के प्रति जुर्म रोकने के लिए पहले से ही हर तरह के नियम कानून विद्यमान हैं। यह मुद्दा कितना बड़ा है इसको समझने के लिए हम बच्चों की जनसंख्या के बारे में सोचें, तो पाएंगे कि 0 से 6 वर्ष के बच्चों की आबादी 154 मिलियन है। 7 से 11 वर्ष के बच्चों की आबादी 132 मिलियन है। 12 से 14 वर्ष के बच्चों की आबादी 80 मिलियन है।
उत्तर प्रदेश में बाल लिंग अनुपात (चाइल्ड सेक्स रेशियो) राष्ट्रीय अनुपात की तुलना में कम है। पश्चिमी उप्र के विभिन्न इलाकों की दशा इस मामले में पूर्वी उप्र की अपेक्षा ज्यादा खराब है हालांकि पिछले दस सालों पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह अनुपात तेजी के साथ घटा है। भारत में बच्चों के साथ लगातार जुर्म बढ़ता जा रहा है। उनकी हत्या, भ्रूण हत्या, अपहरण, खरीद-फरोख्त, मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति तथा बाल श्रम की समस्याएं प्रमुख हैं. वर्ष 2007 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा किए गये एक अध्ययन में यह तथ्य उजागर हुआ कि भारत में प्रत्येक दो बच्चे पर एक बच्चे का यौन शोषण होता है, जबकि हमारे यहां बच्चों के प्रति जुर्म रोकने के लिए पहले से ही हर तरह के नियम कानून विद्यमान हैं।
प्रदेश में बाल संरक्षण के मुद्दे पर समन्वित प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। इस दिशा में लोगों को संगठित करने तथा संवेदनशील बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सिविल सोसाइटी एलायंस के गठन के साथ ही एक नई पहल हुई है। यह एलायंस उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों पिछले दो साल से सक्रिय है, जिसमें लगभग 25 संगठन मिलजुल कर काम कर रहे हैं। संगठन ने यूनिसेफ, सेव द चिल्ड्रेन, प्लान तथा आंगन ट्रस्ट के सहयोग से पिछले दिनों वाराणसी में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यशाला में भाग लेते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाल संरक्षण के मुद्दे पर कार्य कर रहे कई संगठनों ने भविष्य की रूपरेखा तय हुई।केंद्र सरकार, राज्य सरकार के अलावा स्वयं सेवी संगठनों एवं समाज के अन्य तबकों को मिल जुल कर प्रयास करना होगा। वाराणसी में आयोजित कार्यषाला में तैयार हुये दस्तावेजों और रोडमैप के आधार पर राज्य स्तरीय एक दिवसीय कार्यषाला का आयोजन 22 फरवरी को होगा। वहीं उत्तर प्रदेश में राज्य बाल संरक्षण आयोग का गठन शीघ्र किया जाना चाहिये। उप्र की अपनी अलग समस्यायें हैं, तो विशिष्ट उपलब्धियां भी हैं। बाल संरक्षण के मुद्दे क्या हैं इस पर लोगों के बीच मतभेद हो सकता है, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं होनी चाहिये कि बच्चों से जुड़े सवाल पर लापरवाही बरती जाये. इस संदर्भ में सिविल सोसाइटी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ईस्ट यूपी सिविल सोसायटी एलायंस इस दिशा में सकारात्मक और सार्थक भूमिका निभाएगा।
यूनाइटेड नेशंस की यूनिट यूनिसेफ ने अपनी नई रिपोर्ट ‘प्रोग्रेस फॉर चिल्ड्रन-ए रिपोर्ट कार्ड ऑन चाइल्ड प्रोटेक्शन’ में बाल श्रम के मसले पर अनुमान व्यक्त किया है कि दुनियाभर में पांच से 14 साल की उम्र के 15 करोड़ बच्चे चाइल्ड लेबर के दंश को झेल रहे हैं। इनमें से करीब तीन करोड़ बच्चे अकेले भारत में निवास करते हैं। रिपोर्ट में बाल विवाह पर भी चिंता जाहिर की गयी है. रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व के एक तिहाई बाल विवाह अकेले भारत में ही होते हैं. 2007 में भारत में 2.5 करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र तक कर दी गई थी. इतना ही नहीं भारत, बांग्लादेश और नेपाल में कई लड़कियों की शादी दस साल की उम्र के अंदर ही कर दी गई है। मानवाधिकार के क्षेत्र में सक्रिय एडवोकेट अमित शुक्ला के अनुसार, ‘देश में बाल शोषण रोकने के लिए कई कानून हैं, लेकिन इनमें कई गंभीर खामियां हैं। बाल शोषण से निबटने के लिए जो कानूनी ढांचा उपलब्ध है, लोगों को उसकी जानकारी नहीं है और न कोई ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा इस जागरूकता को बढ़ाया जा सके। नतीजतन यह सामाजिक अभिशाप लगातार और गंभीर रूप धारण करता जा रहा है।’
आपदा प्रबंधन एवं बाल अधिकार संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय पूर्वांचल ग्रामीण विकास संस्थान (पीजीवीएस) के सचिव डॉ. भानू के अनुसार, ‘भारत में बाल अधिकारों की स्थिति चिंताजनक है, संतोष की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर अब बाल अधिकारों की बात होने लगी है जो सुखद भविष्य का संकेत है। बच्चों की सुरक्षा एवं विकास से जुड़े अधिनियमों की जानकारी ना सिर्फ स्वयं सेवी प्रतिनिधियों बल्कि केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारियों को भी कराई जानी चाहिये।’ वरिष्ठ पत्रकार मेहरू जफर के अनुसार, ‘बच्चे हमारा भविष्य हैं और उनके हितों की सुरक्षा किए बगैर एक सुरक्षित समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सबसे पहले हमें अपने नजरिए में बदलाव लाना होगा और समस्या के वजूद को स्वीकारना होगा. वहीं इस दिशा में लगातार प्रयास करते रहने की जरूरत है, ताकि कानून और समाज इसके प्रति जागरूक हों।’ बाल शोषण से संबंधित अनेक ऐसे तथ्यपरक आंकड़े हैं, जो आगे की कार्रवाई के लिए आधार का काम कर सकते हैं। अब वह समय आ चुका है कि हम बाल अधिकारों के प्रति गंभीर हों.’ असल में बच्चे देश और हमारा भविष्य है ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम इन फूलों को कुम्हलाने से बचायें।
आशीष वशिष्ठ


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